Harekala Hajabba : The Illiterate Man Who Educated a Village
Harekala Hajabba : The Illiterate Man Who Educated a Village

Harekala Hajabba biography

एक साधारण-सा आदमी जो दिन भर सड़कों पर संतरे बेचता है। उसकी जेब में ज्यादा पैसे नहीं हैं, न कोई बड़ी डिग्री, न कोई शान-शौकत। लेकिन उसके दिल में एक सपना है – अपने गाँव के बच्चों को वह सुविधा देना, जो उसे कभी नहीं मिली। यह कहानी है हरेकाला हजाब्बा (Harekala Hajabba) की, जिन्हें लोग प्यार से “ऑरेंज मैन ऑफ मंगलुरु” कहते हैं।


बचपन और कठिनाइयाँ

हरेकाला हजाब्बा का जन्म 17 फरवरी 1952 को कर्नाटक के मंगलुरु जिले के एक छोटे-से गाँव हरेकाला में हुआ। उनका परिवार बेहद गरीब था। बचपन में ही हालात इतने कठिन थे कि वे स्कूल नहीं जा पाए। शिक्षा अधूरी रह गई, लेकिन जीवन का संघर्ष पूरा चलता रहा।

गरीबी के कारण उन्हें कम उम्र में ही काम करना पड़ा। पहले छोटे-मोटे काम किए और फिर संतरे बेचने का काम शुरू किया। हर दिन वे मंगलुरु की सड़कों पर जाकर संतरे बेचते और उसी से अपना जीवन यापन करते।


वह घटना जिसने जीवन बदल दिया

एक दिन, जब हजाब्बा सड़कों पर संतरे बेच रहे थे, कुछ विदेशी लोग उनके पास आए और अंग्रेज़ी में उनसे कुछ पूछने लगे। हजाब्बा अंग्रेज़ी नहीं जानते थे, इसलिए वे समझ ही नहीं पाए। उस दिन उन्हें बहुत शर्मिंदगी महसूस हुई।

यही घटना उनके जीवन का टर्निंग पॉइंट बनी। उन्होंने सोचा –
“अगर मुझे शिक्षा नहीं मिली तो क्या? मैं अपने गाँव के बच्चों को शिक्षा दिलाऊँगा।”


सपने की ओर कदम

हजाब्बा के गाँव में उस समय कोई स्कूल नहीं था। बच्चों को शिक्षा के लिए दूर जाना पड़ता था, और गरीब बच्चे तो पढ़ाई छोड़ ही देते थे। हजाब्बा ने ठान लिया कि वे अपने गाँव में स्कूल खोलेंगे।

लेकिन यह आसान नहीं था। उनकी आमदनी बहुत कम थी – रोज़ाना संतरे बेचकर मुश्किल से कुछ रुपए ही बचते। फिर भी उन्होंने हर दिन अपनी कमाई में से थोड़े-थोड़े पैसे बचाने शुरू कर दिए।


स्कूल की शुरुआत

1995 में, हजाब्बा ने अपनी बचत से गाँव में एक छोटा-सा स्कूल शुरू किया। शुरुआत में स्कूल में बस एक टीन की छत और कुछ बच्चे थे। लेकिन धीरे-धीरे लोगों ने इस प्रयास को सराहा और सहयोग करना शुरू किया।

आज वही स्कूल एक हाई स्कूल बन चुका है, जहाँ सैकड़ों बच्चे पढ़ते हैं।


समाज की प्रेरणा

हरेकाला हजाब्बा खुद पढ़े-लिखे नहीं हैं, लेकिन उन्होंने शिक्षा का महत्व समझा और पूरे गाँव को बदल दिया। उनका मानना है –
“शिक्षा ही सबसे बड़ा धन है, जो गरीबी को मिटा सकती है।”


पुरस्कार और सम्मान

हरेकाला हजाब्बा के योगदान को पूरे देश ने सराहा।

  • 2020 में भारत सरकार ने उन्हें पद्मश्री पुरस्कार से सम्मानित किया।

  • मीडिया ने उन्हें “ऑरेंज मैन ऑफ मंगलुरु” नाम दिया।

  • उनकी कहानी अब प्रेरणा का स्रोत बन चुकी है।


निजी जीवन

हजाब्बा आज भी बहुत साधारण जीवन जीते हैं। वे भले ही पद्मश्री विजेता हों, लेकिन उनकी पहचान अब भी संतरे बेचने वाले के रूप में ही है। यही सादगी उन्हें और महान बनाती है।


प्रेरणा की कहानी

हरेकाला हजाब्बा की कहानी हमें यह सिखाती है कि बड़े काम करने के लिए बड़े पद या बड़ी डिग्री की जरूरत नहीं होती। जरूरत होती है केवल बड़े सपनों और मजबूत इरादों की। एक साधारण फल बेचने वाला भी पूरे गाँव का भविष्य बदल सकता है।


FAQ (अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न)

प्रश्न 1: हरेकाला हजाब्बा कौन हैं?
उत्तर: हरेकाला हजाब्बा कर्नाटक के एक संतरे बेचने वाले साधारण व्यक्ति हैं, जिन्होंने अपने गाँव में स्कूल बनवाया और बच्चों को शिक्षा दिलाई।

प्रश्न 2: हरेकाला हजाब्बा को पद्मश्री कब मिला?
उत्तर: 2020 में।

प्रश्न 3: उन्हें “ऑरेंज मैन ऑफ मंगलुरु” क्यों कहा जाता है?
उत्तर: क्योंकि वे मंगलुरु में संतरे बेचते थे और उसी कमाई से उन्होंने अपने गाँव में स्कूल बनवाया।

प्रश्न 4: हजाब्बा को शिक्षा के लिए प्रेरणा कैसे मिली?
उत्तर: जब वे एक विदेशी से अंग्रेज़ी न समझ पाने के कारण शर्मिंदगी महसूस करने लगे, तब उन्होंने ठान लिया कि अपने गाँव के बच्चों को शिक्षा जरूर दिलाएँगे।

प्रश्न 5: आज उनका स्कूल कैसा है?
उत्तर: आज वह स्कूल एक हाई स्कूल बन चुका है, जहाँ सैकड़ों बच्चे पढ़ाई करते हैं।

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