कल्पना कीजिए, चीन की एक युवा लड़की जिसे बचपन से ही किताबें पढ़ने और नए-नए प्रयोग करने का शौक है। वह अक्सर पौधों और उनकी पत्तियों को ध्यान से देखती और सोचती कि इन हरे-भरे पौधों में ज़रूर कोई रहस्य छिपा है। यही लड़की आगे चलकर करोड़ों लोगों की जान बचाएगी और नोबेल पुरस्कार जीतकर इतिहास में अमर हो जाएगी। यह कहानी है तू यूयू (Tu Youyou) की।
बचपन और शिक्षा
तू यूयू का जन्म 30 दिसंबर 1930 को चीन के झेजियांग प्रांत के निंगबो शहर में हुआ। उनके परिवार में शिक्षा का बहुत महत्व था। पिता एक बैंक कर्मचारी थे और माँ गृहिणी। बचपन से ही तू यूयू बेहद जिज्ञासु स्वभाव की थीं। उन्हें प्रकृति और चिकित्सा विज्ञान में गहरी रुचि थी।
14 साल की उम्र में, जब वह गंभीर रूप से बीमार हुईं, तब उन्होंने कई महीने स्कूल से दूर बिताए। उसी समय उन्होंने निश्चय किया कि वह जीवन में डॉक्टर या शोधकर्ता बनकर बीमारियों से लड़ेंगी।
उन्होंने पेकिंग यूनिवर्सिटी मेडिकल स्कूल से फार्मेसी में शिक्षा ली और 1955 में स्नातक बनीं। यहीं से उनका वैज्ञानिक सफर शुरू हुआ।
शुरुआती करियर
पढ़ाई पूरी करने के बाद तू यूयू ने चाइना एकेडमी ऑफ ट्रैडिशनल चाइनीज मेडिसिन में शोध कार्य शुरू किया। चीन उस समय गरीबी और बीमारियों से जूझ रहा था। खासकर मलेरिया (Malaria) से लाखों लोग हर साल मर रहे थे।
1960 के दशक में मलेरिया ने वियतनाम युद्ध में भी गंभीर संकट पैदा किया। सैनिक बड़ी संख्या में इस बीमारी की चपेट में आ रहे थे। चीन सरकार ने एक गुप्त प्रोजेक्ट शुरू किया, जिसका नाम था “प्रोजेक्ट 523”। इस प्रोजेक्ट का लक्ष्य था – मलेरिया की दवा खोजनी।
तू यूयू को इस प्रोजेक्ट की प्रमुख वैज्ञानिक बनाया गया।
मलेरिया की दवा खोजने का संघर्ष
तू यूयू और उनकी टीम ने सैकड़ों जड़ी-बूटियों और पौधों पर प्रयोग शुरू किए। वे दिन-रात शोध में जुटी रहतीं। कई बार असफलता हाथ लगती, लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी।
आखिरकार उन्हें प्राचीन चीनी चिकित्सा ग्रंथों में एक सूत्र मिला। उसमें लिखा था कि “किंगहाओ” (Sweet Wormwood / Artemisia annua) नामक पौधे का अर्क बुखार को दूर करता है।
तू यूयू ने इस पौधे पर गहन शोध किया। उन्होंने पत्तियों से अर्क निकालने के विभिन्न तरीके अपनाए। पहले कई तरीके विफल रहे, लेकिन जब उन्होंने ठंडे तापमान पर अर्क निकाला, तो दवा प्रभावी साबित हुई।
इस तरह 1972 में दुनिया को मिला आर्टेमिसिनिन (Artemisinin) – एक ऐसी दवा जिसने मलेरिया से लड़ाई का चेहरा बदल दिया।
साहस और समर्पण
शोध के दौरान तू यूयू ने यह साबित करने के लिए कि दवा सुरक्षित है, पहले खुद पर इसका परीक्षण किया। उनके इस साहस ने उन्हें और भी खास बना दिया। धीरे-धीरे दवा का क्लीनिकल ट्रायल हुआ और यह मलेरिया के खिलाफ चमत्कारी साबित हुई।
वैश्विक प्रभाव
आर्टेमिसिनिन की खोज ने दुनिया भर में करोड़ों लोगों की जान बचाई। आज भी यह दवा विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) की “Essential Medicines List” में शामिल है और मलेरिया के इलाज की सबसे प्रभावी दवा मानी जाती है।
नोबेल पुरस्कार और सम्मान
तू यूयू के योगदान को देर से सही, लेकिन विश्व स्तर पर मान्यता मिली।
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2015 में उन्हें नोबेल पुरस्कार (Physiology or Medicine) से सम्मानित किया गया। वे नोबेल पुरस्कार पाने वाली पहली चीनी महिला वैज्ञानिक बनीं।
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उन्हें लास्कर पुरस्कार (2011) भी मिला।
उनकी सफलता ने यह साबित किया कि पारंपरिक ज्ञान और आधुनिक विज्ञान मिलकर मानवता के लिए चमत्कार कर सकते हैं।
निजी जीवन
तू यूयू हमेशा एक साधारण और विनम्र जीवन जीती हैं। उन्होंने कहा था –
“मैं नोबेल पुरस्कार की परवाह नहीं करती, मेरे लिए सबसे बड़ा पुरस्कार है लोगों की जान बचाना।”
कहानी का अंत, लेकिन प्रेरणा की शुरुआत
चेन्नई का वह छोटा बच्चा शतरंज में दुनिया जीतता है (जैसा कि आनंद की कहानी में देखा), वैसे ही चीन की यह महिला वैज्ञानिक बीमारियों से लड़ने में दुनिया की हीरो बन गई। तू यूयू ने साबित किया कि जिज्ञासा, समर्पण और धैर्य से असंभव भी संभव हो सकता है।
FAQ (अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न)
प्रश्न 1: तू यूयू कौन हैं?
उत्तर: तू यूयू चीन की वैज्ञानिक हैं जिन्होंने मलेरिया की दवा “आर्टेमिसिनिन” की खोज की।
प्रश्न 2: आर्टेमिसिनिन क्या है?
उत्तर: यह एक दवा है जो “किंगहाओ” नामक पौधे से प्राप्त होती है और मलेरिया के इलाज में सबसे प्रभावी है।
प्रश्न 3: तू यूयू को नोबेल पुरस्कार कब मिला?
उत्तर: उन्हें 2015 में चिकित्सा विज्ञान के लिए नोबेल पुरस्कार मिला।
प्रश्न 4: वे किस प्रोजेक्ट से जुड़ी थीं?
उत्तर: वे चीन सरकार के “प्रोजेक्ट 523” से जुड़ी थीं, जिसका उद्देश्य मलेरिया की दवा ढूंढना था।
प्रश्न 5: उनकी खोज का असर कितना बड़ा है?
उत्तर: उनकी खोज से दुनिया भर में करोड़ों लोगों की जान बचाई गई और आज भी यह दवा मलेरिया के इलाज में मुख्य रूप से उपयोग होती है।

